ढूढ़ने चला वो 'इश्क़' कायनात के आयतों में
उसे क्या पता कमख्त ने,
रेत की चादरें बिछा रखी थीं।
कागज़ में लिखी हर दिशाओं में उसे ढूढ़ा
कमबख्त ने,
खुद को परदानशीं कर रखा था।
हारा नहीं, ढूढ़ने निकला फ़िर किताबों में
कमबख्त ने,
किताबों को भी लिहाफ़ पहना रखा था।
गया जब हर गली, हर चौक-चौराहे पर
कमबख्त ने,
वहाँ उजालों को रोक अँधेरा कर रखा था।
आख़िर जब गिरा रब की चौखट पर तब
पता चला कमबख्त ने,
सितारों की भीड़ में घर बना रखा था।
By- राहुल
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